
दिल्ली स्थित Jawaharlal Nehru University (JNU) एक बार फिर सुर्खियों में है। छात्र संघ द्वारा निकाले गए मार्च के दौरान पुलिस और छात्रों के बीच तीखी झड़प हो गई। दोनों पक्ष अपने-अपने दावों के साथ खड़े हैं और सच, हमेशा की तरह, बीच में कहीं अटका है।
पुलिस का पक्ष: “अनुमति नहीं, फिर भी मार्च”
Delhi Police का कहना है कि करीब 300 छात्र बिना अनुमति के इंडिया गेट की ओर मार्च कर रहे थे। जब बैरिकेडिंग कर उन्हें रोका गया, तो कथित तौर पर धक्का-मुक्की, जूते और लाठियां फेंकी गईं। पुलिस के अनुसार, कई जवान घायल हुए और स्थिति नियंत्रण से बाहर जाती दिखी।
छात्रों का आरोप: “ओवरयूज़ ऑफ फोर्स”
वहीं प्रदर्शनकारियों का दावा है कि पुलिस ने जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग किया। एक महिला छात्रा ने आरोप लगाया कि सादे कपड़ों में मौजूद 4-5 लोगों ने उसे भीड़ से खींचा, जिससे उसके हाथ में गंभीर चोट आई।
14 छात्र हिरासत में, कोर्ट से राहत
घटना के बाद पुलिस ने 14 छात्रों को हिरासत में लेकर एफआईआर दर्ज की। सभी को Patiala House Court में पेश किया गया। पुलिस ने न्यायिक हिरासत की मांग करते हुए कहा कि आगे की जांच के लिए यह जरूरी है। बचाव पक्ष ने दलील दी कि छात्र जांच में सहयोग को तैयार हैं और लिखित अंडरटेकिंग देने को भी राजी हैं।
कोर्ट की कार्यवाही के बाद छात्रों को राहत मिली, जिससे मामला अब कानूनी और राजनीतिक दोनों पटरियों पर आगे बढ़ रहा है।
कैंपस में कड़ी सुरक्षा
घटना के बाद JNU कैंपस में पुलिस और पैरामिलिट्री बल की तैनाती बढ़ा दी गई है। सुरक्षा व्यवस्था कड़ी है और प्रशासन किसी भी नए विरोध को लेकर सतर्क है।

विरोध या टकराव?
विश्वविद्यालय बहस और असहमति की प्रयोगशाला होते हैं। लेकिन जब बहस बैरिकेड से टकरा जाए, तो सवाल उठते हैं क्या संवाद की जगह टकराव ले रहा है? क्या अनुमति की राजनीति, अभिव्यक्ति की आज़ादी से बड़ी हो गई है?
सच यह है कि कैंपस की सियासत अब सिर्फ कैंपस तक सीमित नहीं रही। हर नारा, हर लाठी, हर बैरिकेड—सीधे राष्ट्रीय विमर्श में एंट्री लेता है।
जांच जारी है। दिल्ली पुलिस का कहना है कि पहले भी ऐसे प्रदर्शनों को लेकर चार अलग-अलग एफआईआर दर्ज हो चुकी हैं। अब नजर इस बात पर रहेगी कि जांच किस दिशा में जाती है—और क्या अगला मार्च बहस का होगा या फिर बैरिकेड का।
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